मानव विकास के क्रममें आगे बढ़ता हुआ मशीनी युग में पहुंच गया है, तथा उसकी उपभोग की प्रवृत्ति इतनी बढ़ गई है कि, हम अपने आगे आने वाली पीढ़ियों के प्रति असंवेदनशील हो गए हैं। हम इस बात पर प्रसन्न है कि, हम आधुनिक जीवन आराम से जी रहे हैं, बल्कि हम इस बात से बिलकुल बेखबर है कि अपनी संतति को एक जहरीला और बीमार वातावरण दे रहे हैं। जहां हमारे पूर्वजों ने हमें शुद्ध नदियां हरे-भरे जंगल प्रदान करके एक स्वस्थ जीवन दिया, वही हम अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने के लिए ना तो शुद्ध वायु ना पीने के लिए शुद्ध जल से प्रदान कर पा रहे हैं। आज पीने की पानी की समस्या न केवल शहरों में बल्कि गांव में भी होने लगी है। हर घर में वाटर प्यूरीफायर लगाने पड़ रहे हैं न केवल नदियां बल्कि गांव के कुएं और हैंडपंप के जल भी दूषित हो चुके हैं। क्या हमने इस ओर ध्यान दिया है ? कि अपने आगे आने वाली पीढ़ियों को कितना जहरीला वातावरण और विभिन्न प्रकार के रोग देते जा रहे हैं, शायद नहीं परंतु अब हमें इस और सोचना ही नहीं कुछ करना भी होगा। इसके लिए हमें अपनी संस्कृति के कुछ पन्ने भी पलटने पड़ेंगे। इतने कम समय में स्थित इतनी भयावह हो गई है कि, संभवत यह हमारे सोच का परिणाम है कि कहीं ना कहीं कोई भी विसंगति अवश्य है, हमारी सोच में या मौजूदा व्यवस्था में।
क्रमशः…..…

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